मृत्यु संस्कार

(मृत्यु से सम्बन्धित किये जाने वाले संस्कारें)

जन्म-मृत्यु ईश्वरीय विधान है, जो पूर्व नियोजित है। इस नश्वर जगत में जो जन्मा है, उसकी मृत्यु भी अवश्यंभावी है, ईश्वरीय विधान में जन्म के साथ ही मृत्यु की तिथि अंकित हो जाती है। मृत्यु के कारण पृथक हो सकते हैं परन्तु मृत्यु का स्वरूप एक ही होता है, राजा अथवा रंक में कोई भेद नहीं है। कहा गया है-
आया है सो जायेगा, राजा, रंक, फकीर।
शास्त्रों में वर्णित चौरासी लाख योनियों में यह जीव जन्म लेता तथा मृत्यु को प्राप्त होता, परन्तु मानव योनी सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। पूज्य गोस्वामी संत तुलसीदास जी ने भी रामचरितमानस में कहा है-
बड़े भाग मानुश तन पावा, सुर दुर्लभ मुनि ग्रंथन गावा।।
अत: बन्धुओं इस नश्वर जगत में जन्म लेकर यदि हमने अच्छे कर्म नहीं किये तो हमारा जीवन व्यर्थ जाता है, जो बड़ी ही कठिनाइयों से प्राप्त है, वह भी नहीं रहता, मृत्यु तो शरीर(पंचतत्व निर्मित स्थूल देह) की होती है। आत्मा तो मानव द्वारा किये गये अच्छे कार्यो के रूप में इस जगत में सदैव परमात्मा अंश रूप में जीवित रहती हैतथा जाति, धर्म, परिवार एवं सम्पूर्ण मानवता के लिये पे्ररणा स्त्रोत होती हैं। इन्ही प्रेरणा स्त्रोत कार्यो को हम पूर्वजों का आर्शीवाद कहते हैं, यही जीवन का यथार्थ है, जो मनुष्य जीवन के भेद को जान लेता है, वह मृत्यु से कभी भयभीत नहीं होता, जिसे जीवन का सत्य ज्ञान हो जाता है, वह सत्य को कभी नहीं छोड़ता, जो सत्य नहीं छोड़ता, वह दुष्कर्म कभी नहीं करता तथा मृत्योपरान्त सद्गति को प्राप्त होता है। सत्य ही राम है, राम ही सत्य है। यदि आप में सत्य की स्वीकार्यता है, तो मुख में सदैव राम है, इसके लिये जीव को कठिन साधना की आवश्यकता है। रामायण जी में कहा गया है-
कोटि कोटि मुनि यतन कराही,
अंत राम कहि आवत नाही।
राम (सत्य) बसहिं जिनके मन मांही,
तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं।

मृत्यु नाम सुनने में भले ही भयानक एवं दुखद हो परन्तु यथार्थ में मृत्यु बड़ी ही कोमल एवं सुखद होती, जीव इस माया जगत से मुक्त हो चिरनिन्द्रा में लीन हो जाता है। दैहिक, दैविक, भौतिक सभी तापों से मुक्त हो जाता। ममता, मोह से मुक्त हो सत्य कर्मो के सभी परमधाम मोक्ष को प्राप्त कर, ब्रम्ह में विलीन हो जाता है।

1. वयस्क पुरुष / महिला मृत्यु संस्कार

दाह संस्कार हेतु लगने वाली सामग्री :-
2. बांस लम्बाई 8 फीट, खपच्ची, घास या पैरा सूखा अर्थी को नरम बनाने हेतु, सुतली 150 ग्राम, रंगीन सूत 1 बड़ी गिट्टी, एक काली हॉडी, कण्डे 15 नग, सफेद मलमल 2.5 मीटर + 1.5 मीटर, एक भाल, 1 लाल घड़ा, लोटा, थैला, जल परिक्रमा हेतु यथाशक्ति माला-फूल, चन्दन की लकड़ी 1 मूठा, कुछ छिपली, रार डेढ़ किलो, तिली-जवा 50-50 ग्राम, गंगाजल, इत्र 1 शीशी, शहद 1 शीशी, माचिस 1 नग, लाई धान की 500 ग्राम, कुछ चिल्लर, केले के पत्ते 2 नग, जौ का आटा 500 ग्राम, मर्दाना सफेद धोती 1 नग, पंचक की स्थिति में बेसन 200 ग्राम। मृतक महिला होने पर एक साड़ी सुहाग सामग्री।
ध्यान दें कि :- प्रचलित नियमानुसार (मृतक) पुरुष का दाह संस्कार पिता का पुत्र द्वारा बड़ा या छोटा पुत्र न होने की स्थिति में भाई अथवा भतीजों द्वारा संस्कार किया जाना चाहिये। सुहागन महिला का संस्कार पति द्वारा किया जाना चाहिये। एकल स्थिति (मृतक) की होने पर समाज की पंचाग्नि दी जानी चाहिये।

कृत्य विधि :-

सर्वप्रथम घर में मृतक शरीर को भूमि पर दरी आदि बिछाकर लिटा दे, ऊपर से साफ चादर ओढ़ा दें। अर्थी तैयार होने पर आचार्य, नाई को बुलाकर घर के अन्दर आचार्य की सलाह से जौ के आटा से तिल जौ डालकर बायें हाथ से दाह संस्कार करने वाले व्यक्ति को 5 पिंड तैयार करना चाहिये, यदि न बने तो नाई सहयोग करें, पश्चात शास्त्रीय विधि से मृतक के लिये एक पिण्ड का दान करें। तत्पश्चात (मृत देह को) मृतक के पुत्र, चाचा आदि परिवार जन उठाकर अर्थी पर रखें। नाई काली हाड़ी में अग्नि प्रज्वलित कर रख लें, बाहर पुन: आचार्य द्वारा शास्त्रीय विधि से पिण्डदान कराया जाय। पष्चात परिवार के सभी लोग मृतक के दर्शन करें, माला फूल चढ़ाये एवं यथा उचित चरण स्पर्श करें। पश्चात व्यविस्थत कर अर्थी को कान्धा देने प्रथम पुत्र, भाई, बन्धु-बान्धव, परिवार के ही लोग सम्मिलित हो पुत्र की मृत्यु पर पिता को कन्धा देना वर्जित है। क्रमश: अन्य सभी व्यक्ति अर्थी को कन्धा देने का पुण्य लाभ लेते हुए शमशान की ओर प्रस्थान करते हैं। रास्ते में धान की लाई/मखाने चिल्लर सिक्कों के साथ अर्थी के उपर से फेंकते हुए ‘राम नाम सत्य है, सत्य बोलो मुक्ति है’ का मुखोच्चारण करते हुए चलते जाते हैं। शमशान घाट के निकट पीपल अथवा बटवृक्ष अथवा नियत स्थान पर अर्थी को उतार दें। एवं पुन: एक पिण्डदान कर अगरबत्ती लगायें तथा कुछ नगद राशी स्थान कर्ज उतारने वहीं छोड़ दें एवं अर्थी को उठायें व घुमाकर आगे को पीछे कर शमशान घाट ले जाकर निश्चित स्थान पर रख मृतक के शरीर को बन्धन मुक्त करें, यदि कोई जेवर आदि धारण किये हों, उन्हें उतारकर रख लें, यदि मृतक सुहागन महिला है, तो सभी जेवर एवं चूड़ी आदि

दाह संस्कार

उतारकर लायें। घर की महिलायें इन्हें शुभ मानते हुये परस्पर बांट लेती हैं। पश्चात यदि मृतक पुरुष है, तो नाई द्वारा दाढ़ी बनाने के उपरान्त संस्कार करने वाले को पुराने वस्त्र अलग कर स्नान करा, चिता में उत्तर की ओर सिर कर लिटायें तथा वहां पर आचार्य द्वारा 5 में से शेष दो पिण्ड दान कराये जॉंये, बाद में दसों इन्द्रियों में दस चन्दन की लकड़ी मस्तक एवं नेत्र में कपूर तथा मस्तक से पैरों तक सभी जोड़ो में घी सहित तिली-जवा रखें पश्चात इत्र शहद आदि छोडे़, बाद में अगरबत्ती जला चिता की परिक्रमा कर एक ओर लगा दें, तत्पश्चात जलती हुई पांच लकड़ी उठाकर मुखाग्नि दें, चिता जलने से जब ब्रहा्राण्ड (मस्तक) खुल जाय तब कपाल क्रिया का एक बांस लेकर तिली-जवा, मिश्रित घी में एक सिरा डुबाकर मृतक के कपाल से तीन बार स्पर्ष करते हुये, परिक्रमा लगायें, पश्चात चिता के ऊपर से फेंक दें। तत्पश्चात जल धारा हेतु घडे़ के जल में गंगाजल मिलाकर नाई एक पत्थर से घड़े में छिद्र कर देता है, जिससे धारा प्रवाहित होती है, कन्धे में रखकर चिता की 3 परिक्रमा कर चिता की ओर पीठ कर छोड़ देना चाहिये। पश्चात दाहकर्म करने वाले को लेकर परिवार सहित उसी समय घड़े में छेद करने वाली कंकड़ी को दाहकर्म करने वाले को अपने पास रख लेना चाहिये। इसी को रखकर शुद्धता तक तिलांली देना चाहिये, बाद में नदी में विसर्जन कर लेना चाहिये। सामान्य जन चन्दन लकड़ी की आहुति देते हुये चिता की एक प्रदक्षिणा करें, पश्चात वहीं बने सभा भवन में एकत्र हो कर शोकसभा सम्पन्न करें। उसी सभा में शोकाकुल परिवार से कुछ कर खारी एवं शुद्धता के समय की घोषण करें। यह घोषण समाज के अध्यक्ष अथवा उपिस्थत पंच अथवा समाज के ही किसी सम्मानीय बुजुर्ग व्यक्ति द्वारा करवानी चाहिये। पश्चात वहां से बिदा ले, मार्ग में पड़ने वाले नदी, तालाब, पनघट में स्नानकर दाह संस्कार करने वाले के साथ सभी परिवारजन, मृतक को तिलां ली देवें। ततपश्चात घर में आकर द्वार पर पहले से नाई द्वारा रखी लोहे की कड़ाही में रखी नीम की पत्ती तथा जल से पांव धो लेवे कुछ जल अपने उपर छिड़क लें तथा नीम पत्ती दांत से खुटकने का अर्थ करये दिनों से हैं, पश्चात घर में 13 दिनों तक स्वादहीन भोजन (बिना हल्दी नमक) का प्रथम दिन सभी के लिये अनिवार्य है, बाद के 13 दिनों में हल्दी सभी को वर्जित है, शेष सादा भोजन खा सकते हैं। दैनिक रूप से प्रतिदिन सांयकाल घर के बाहर दातून तथा डबुलिया में पानी एवं एक दीपक दक्षिण दिशा की ओर जलाकर रखना चाहिये, शुद्धता तक घर के अन्दर मृत का चित्र उनके सोने के कमरे में रखकर प्रतिदिन दिया जलाना चाहिये तथा नियम, संयम से रहना चाहिये। पान आदि का सेवन सम्पूर्ण परिवार को नही करना चाहिये। पूर्व में घट बांधे जाते थे,
नोट :-
अ. दाह संस्कार पंचक में दोषपूर्ण होने के कारण परिमार्जन स्वरूप मृतक के साथ चार बेसन के पुतले बनाकर अर्थी के साथ में रख दिये जाते हैं, जिससे पंचक दोष का शमन हो जाता है। (पंचक का शांति विधान दषगात्र/त्रयादषी के साथ करवा लेना आवष्यक है)।
ब. शुद्धता 3 दिन से कम में नही होनी चाहिये। परन्तु परिस्थति बस कम समय में भी की जा सकती है।
स. तेरहवीं में मृत्यु भोज पूर्णत: वर्जित है।
द. दाह संस्कार सूर्यास्त होने के उपरान्त नहीं किया जाना चाहिये। परन्तु परिस्थति बस कर सकते है।

2. बाल्य मृत्यु संस्कार :-

छोटे बालक-बालिकाओं (12 वर्ष उम्र तक) का ही अन्तिम संस्कार भूमिदाह के रूप में करना चाहिये। क्योंकि कन्या रजस्वला होने पर स्त्रीत्व प्राप्त कर लेती है तथा बालक कर्ण छेदन के पश्चात । पूर्व काल में कर्ण छेदन के समय हम गहोई जन में, जगत जननी के नाम से दुर्गा जनेऊ का संस्कार किया जाता था, जो बालक को (दीक्षित) होने की परिधि में ला देता था तथा इस आयोजन हेतु अधिकतम 11 वर्ष आयु सीमा निर्धारित थी। चूंकि ‘दीक्षित’ बालक पुरुषत्व की परिधि में आता है, अत: 12 वर्ष से अधिक उम्र के बालक-बालिकाओं का दाहसंस्कार ही किया जाना चाहिये।

3. शिशु मृत्यु संस्कार (पांच वर्ष से कम आयु के लिये) :-

बालक, बालिकाओं के शवों का भूमिदाह करने हेतु
निम्न सामग्री की आवश्यकता होती है :- कफन का वस्त्र सफेद 2 मीटर नीचे गडढ़े में बिछाने हेतु 1 मीटर, नमक 3 किलो, राई 100 ग्राम, अगरबत्ती एक पुड़ा, फूल-माला, कपूर 5 ग्राम, पंचरत्नी 1 नग, दिया या मोम बत्ती 1 नग। ऐसे बालक का दाहसंस्कार पिता के छोटे भाइयों अथवा यदि बड़े पुत्र आदि हो तो उनके द्वारा किया जाना चाहिये। शमशान भूमि में जाकर किसी अच्छे स्थान का चयन कर उपयुक्त गहराई में नमक डालकर शव को रखें पश्चात पंचरत्नी शव के हाथ में रखें पुन: नमक डालकर प्रथम परिवार उपिस्थत सदस्य उस पर पांच अंजली मिट्टी डाले बाद में सभी सदस्य शव को अच्छी तरह से मिट्टी से ढंक दें पुन: जल छिड़ककर धरा से समतल करें तथा राई बो दें तत्पश्चात् वजनदार पत्थर आदि रख दें, ताकि जानवर आदि शव को नुकसान न पहुंचायें पश्चात पुष्पों से स्थान को सुसज्जित कर दें। धूप दीप जलाकर आरती करें तथा परम पिता परमात्मा से उसके मोक्ष हेतु प्रार्थना करें, संभव हो, तो उसी समय वहां पर वृक्षारोपण कर दें। इस संस्कार का सूतक मात्र स्नान तक ही होता है। स्नान उपरान्त सूतक समाप्त हो जाता है। आगे की कोई रस्म नहीं की जाती, यदि आप चाहें तो दूसरे या तीसरे अथवा जब भी उचित समझें कन्या भोजन एवं गरीबों को व बा्रम्हणों को ‘उसके’ नाम से भोजन करायें तथा यथा शक्ति दान आदि करें, इससे स्वयं को तथा मृत आत्मा को परम शांति की प्राप्ति होती है।
नोट :- स्मरण रहे जब कभी भी किसी तीर्थ पर गया जी अथवा बद्रीनाथ में पूर्वजों का पिण्डदान करें, तब उन सभी बाल्य आत्माओं के नाम का भी पिण्डदान करें, जो परिवार में जन्मी पर नहीं रहीं। 6-7 वर्ष से अधिक तथा 12 वर्ष से कम आयु के बाल्य दाह संस्कार में शव को अर्थी में ले जाना उचित होगा। अत: अर्थी ही बनाना चाहिये, इसमें बांसों की लम्बाई 6 फीट रखनी चाहिये, शेष सभी कार्य उसी प्रकार किया जाना जैसे छोटी उम्र का होना है, कुछ सामग्री में बदलाव होगा, जैसे नमक कम से कम 8 से 10 किलो एवं कफन का कपड़ा 2 मीटर एवं एक शल की आवश्यकता होगी। इनकी शुद्धता तीसरे दिन की जानी चाहिये तथा तीसरे दिन ही देव दर्शन स्थानीय समाज के पंचों द्वारा कराया जावेगा। शोकाकुल परिवार यदि चाहे तो बाल्य मृत आत्मा की शांति हेतु श्री गणेश, विष्णु जी की पूजा करवा सकते हैं तथा कन्या, ब्राम्हण, भिच्छुक आदि भोजन करा सकते हैं। मृत आत्मा के नाम से दान पुण्य कर सकते हैं।

नोट :-

(अ) यदि शोकाकुल परिवार चाहे तो पांच वर्ष से अधिक के बालक, बालिकाओं का भी दाह संस्कार किया जा सकता है परन्तु आगे के सम्पूर्ण कार्य दाह संस्कार के विधान अनुसार जिसमें त्रयोदशी भी सम्मिलत है, करने होंगें।
(ब) मृतक की अस्थियाँ विसर्जन हेतु निर्णय करना कि कहां विसर्जन की जानी है, इसका प्रथम अधिकार मृतक की पत्नी अथवा पति तथा पुत्रों को है, यह उनका दायित्व है कि वह मृतक की पूर्व इच्छा एवं परिवार जन की परामर्श अनुसारअस्थि विसर्जन का कार्य सम्पन्न करें, इसके लिये कोई बन्धन नहीं है।

फूल एवं भस्मी-संस्कार:-
इस संस्कार के लिये निम्न सामग्री को सुविधानुसार एक दिन पहले जुटा लें। गाय का गोबर, 1 पाव गाय का दूध, गंगाजल, इत्र 2 शीशी, शहद 2 शीशी, पंचरत्नी 2 नग, घड़ा ढक्कन सहित 1 नग, दिया छोटे 6 नग, मीठा तेल 200 ग्राम, लम्बी बाती 1 पैकेट, अगरबत्ती 2 पैकेट, माचिस 1 नग, कपूर 10 ग्राम, राई 100 ग्राम, नमक खड़ा 1 किलो, गेंहू 1 किलो, लोहे की कीलें 3 इंची 5 नग, कच्चा सूत/रंगीन सूत 1 मिट्टी, माला बड़ी 3 नग, छोटी 4 नग, खुले फूल 500 ग्राम, काली तिल 25 ग्राम, जौ का आटा 200 ग्राम, खुले पान 10 नग, लगा पान 1 नग, पुरुष के लिये अथवा सुहागन के लिये, मीठा 250 ग्राम के 2 डिब्बे, फल पांच किस्म के 2 जगह (केला नहीं), कुछ नगद सिक्के आदि (सेविंग मुण्डन कराने के लिये व्लेड, फिटकिरी आदि, फूल के लिये 1 थैली, खारी (भस्मी) के लिये एक बड़ी बोरी, चांदी की छोटी 1 गाय की प्रतिमा, सीधा (आटा, उड़द की दाल, चावल, शुद्ध घी, शक़्क़र, नमक आदि) 2 जगह, मृतक के पुराने वस्त्र, पांच पुराने बर्तन, 1 लोटा, 1 मीटर सफेद वस्त्र।

खारी (भस्मी) फूल उठाना :-

प्रात: 8 बजे अपने बन्धु बान्धवों परिजनों सहित शमशान घाट (नोट- दाह क्रिया करने वाला व्यक्ति घर से स्नान करके जाय) सर्वप्रथम चिता स्थल को दूध छिड़कें, पुन: गंगाजल छिड़ककर थैली में सबसे पहले एक पंचरत्नी डाले तथा दाह करने वाला व्यक्ति लकड़ी की चमीटी बना या फूलों से दबाकर पांच फूल चुनकर थैली में रख लें। इसे भूमि पर न रखें। बाद में पूरी भस्मी अच्छी तरह समेटकर बोरी में भर लें। तथा साफ स्थान पर रख लें। पश्चात 1 बाल्टी पानी में गाय का गोबर घोलकर चिता स्थल की भूमि अच्छी तरह से लीप दें तथा पूरे में राई बिखरा दें, तात्पर्य यह कि जली हुई भूमि को उपजाउ बना दें। नमक भी पूरी तरह फैला दें, फिर जल से भरे हुये कुम्भ में गंगाजल, दूध डालें तथा दिये को उसके उपर रखकर चिता के मध्य में रख दें। दिया में तेलबत्ती भी भर दें। फिर चिता के चारों कोने में लोहे की कीलें गाड़ दें तथा कच्चा सूत चारों तरफ लपेटकर सैया का रूप दें। धागे की पिण्डी को घडे़ तक ले जाकर वहीं छोड़ दें। रंगीन सूत घड़े में लपेटें, चिता के चारों कोने में चार जल कुम्भ (डुबलिया) रखकर उनपर दिया तेलबत्ती डालकर रख दें। फिर सर्वप्रथम बीच का दीप प्रज्वलित कर बाद में चारों दीप जला दें। पुन: गंगाजल छिड़ककर स्नान करायें, पश्चात बीच कुभ में माल्यार्पण करें, लटकने वाला भाग पैरों की ओर रखें। दीप की ज्योति दक्षिण की ओर रखें, शेष छोटी मालायें चारों कुम्भों में पहनायें, बीच के कुम्भ की माला के निचले छोर की तरफ एक पत्तल अथवा दोना में फल रख दें। मीठा का डिब्बा खोलकर रखें। फिर नेत्र बन्दकर मृतक आत्मा से भोजन जल ग्रहण करने का अनुरोध करें। अगरबत्ती (सुगन्ध) जलाकर उसकी सुगन्ध घड़े की ओर करें। इत्र रूई में डालकर कुम्भ के पास रख दें या माला में पिरा दें, यदि मृतक पुरुष अथवा सुहागन महिला है, तो चिता स्थल पर गुलाल फैला दें, साथ में लगा हुआ पान,फलों के पास रख दें, फिर एक दिये में कपूर जला दें, इसके बाद उपिस्थत सभी जनों को फूल दे दें तथा पूर्ण चिता स्थल पर फूल बिखेर दें। चिता के उत्तर की ओर ईश्वर का नाम अंकित कर दें। सभी लोग परिक्रमा कर प्रमाण करें। शमशान में डोम को कम से कम 11/-, 21/- तथा एक सीधा की पोटली उसे दें दें। फूल यदि इलाहाबाद संगम ले जाना हो तो थैली में मृतक का नाम लिखकर वहीअस्थिया भण्डार गृह में रखवा दें, अथवा पीपल के पेड़ पर टांग दें।

खारी (भस्मी) विसर्जन:-

फूल एवं भस्मी विसर्जन का कार्य:- खारी (भस्मी) को साथ लाए हुये बड़ी बोरी में भरकर समीप की नदी के तट पर रख दें। बोरी का मुख खोल दें, फिर उसके अन्दर पहले पंचरत्नी डाल दें, गंगाजल, गाय का दूध, घी, शहद, इत्र, फूलमाला चढ़ाकर, अगरबत्ती जलाकर पूजन कर भस्मी जल में विसर्जन कर देवें।
गंगा तट संगम में फूल एवं भस्मी विसर्जन का कार्य :- अपने पंडा जी/महापात्र द्वारा बताई क्रिया विधि के अनुसार पिण्ड दान/भस्मी/‘फूल (अस्थिया) विसर्जन का कार्य करें।

शुद्धता:-

यदि खारी (भस्मी) के दिन ही शुद्धता करनी हो, तो शमशान घाट पर बैठकर बाल बनवायें (पिता की मृत्यु होने पर सभी पुत्रों का सिर मुडवाये) अन्य की मृत्यु पर संस्कार करने वाले व्यक्ति को बाल बनवाना मुण्डन करवाना अनिवार्य है, शेष परिवार वालों की इच्छा पर निर्भर करता है, वैसे बड़ों की मृत्यु पर बाल देना धार्मिक दृष्टि से उत्तम कार्य होता है। यहां घर पर महिलायें घर की साफ-सफाई करके सभी वस्त्र आदि धोकर, सफाई, पुताई आदि जो सम्भव एवं आवश्यक हो करलें। शुद्धता के दिन शाम के समय रिश्तेदार बन्धु बाधव, मित्र, समाज आदि के लोग बैठने आते है। अत: 4 बजे के पूर्व घर के उचित स्थान पर अथवा खुले आंगन में बिछाई बिछाकर रखें। घर के मुखिया का उपिस्थत रहना अनिवार्य है।

पगड़ी रस्म एवं देव दर्शन :-

यह आयोजन शुद्धता के दिन सांय ठीक चार बजे निर्धारित समय पर ही पूर्ण किया जाता है, इस आयोजन में स्थानीय समाज के पंच गण, बन्धु बान्धव, कुटुम्बीजन, नाते - रिश्तेदार एवं अन्य समाज सम्प्रदाय के परिचित ईस्ट मित्र उपरोक्त काल निश्चित समय पर एकत्रित होते हैं। अत: शोकाकुल परिवार को चाहिये कि नियत समय से पूर्व संभावित आगमन की संख्या के अनुसार उपयुक्त स्थान पर उनके बैठने आदि की व्यवस्था कर देना चाहिये। तथा वहां पर किसी उंचे स्थान पर या टेबल आदि के ऊपर साफ सुन्दर वस्त्र बिछाकर मृतक का फे्रम किया हुआ चित्र रख दें तथा माल्यार्पण कर इत्र आदि सुगन्धि लगाकर अगरबत्ती दानी किसी थाली आदि मेंरख कर जला दें एवं शुद्ध घी का दीप ज्योति जलाकर चित्र के सामने रख दें। एवं उपिस्थत के आंकलन अनुसार खुले फूल गुलाब की पंखुडी आदि एक साफ सुन्दर पात्र मे जनसमुदाय द्वारा दी जाने वाली पुष्पांजलि हेतु रख दें।

पगड़ी रस्म :-

वस्तुत: पगड़ी रस्म में (मृतक के साले) अर्थात मामा की ही पगड़ी लगती है (कारण) पिता की मृत्यु होने पर पुत्रों की मां के भाई का सबसे बड़ा अधिकार भांजो पर जाता है तथा मुखिया चयनित कर जिम्मेदारी सौंपने में उसका कोई विरोध भी नहीं कर सकता। पगड़ी बंधवाने तथा मुखिया बनने का दायित्व बोध वर्तमान में लोग नहीं समझते इसे मात्र रस्म अदायगी मानते है। मूल भाव यह है कि आज से घर परिवार समाज के मुखिया के रूप में आपको जिम्मेदारी सौंपी जा रही है। अब से हमें आप सभी को इसके सम्मान की रक्षा करनी होगी। महिलाओं तथा बच्चों की मृत्यु होने पर पगड़ी बंधन नहीं होगा, केवल देव दर्शन होंगें।

देव दर्शन :-
पूर्व निश्चित समय ठीक 4 बजे उपिस्थत समाज के पंचगण व बुजुर्ग प्रतिष्ठत जन दाह संस्कार करने वाले, सदस्य के सिर पर मामा के द्वारा पगडी बंधवाते हैं तथा पास मे मंदिर में दर्शन करने हेतु शोकाकुल परिवार को आगे कर ले जाते है। ईश्वर के दर्शन करा चरणामृत लेते हैं।

3. पुष्प श्रद्वांजली :-
वापस आकर सभी लोग अपना स्थान ग्रहण करते हैं। शोकाकुल परिवार के सभी पुरुष सदस्यों से थाली में रखी हल्दी गांठो का स्पर्श कराया जाता है, फिर एक कोरे कागज में दाह कर्म करने वाले सदस्य से भगवान के 5 नाम लिखकर कुटुम्ब के अन्य पुरुष सदस्यों से भी एक-एक भगवान के नाम का लेखन किया जाता है। इसके बाद थाली में लगे पान रखकर पारिवारिक सदस्यों को खाने के लिये कहा जाता है।

ऐसी मान्यता है कि मृत आत्मा की स्वर्ग यात्रा के इन तेरह दिन तक प्राणी के विछोह पश्चात उस आत्मा द्वारा प्राणीरूप मानव शरीर रखकर उनके परिवार के लिये जो ममता मोह पूर्वक सत्कार सेवा दायित्व किये गये अब उनकी पार्थिव देह को समाज के शास्त्र सम्मत नियमानुसार पंचतत्वों में विलीन कर उनकी आत्मा को इस परिवार के बंधन से मुक्त कर ईश्वर से शोकपूर्वक प्रार्थना करते रहे कि हे प्रभू! आपके लोक में आने वाली इस आत्मा को मोक्ष प्रदान करें। उस प्राणी के स्वर्गवासी होने पर अब इस परिवार की जिम्मेदारी रूपी पगड़ी का उत्तराधिकारी सबसे पहले मंदिर जाकर ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। समाज के पंच, प्रतिष्ठत जनों, पड़ोसियों , रिश्तेदारों के सामने मृत प्राणी के छूटे अधूरे कार्यो सहित सभी दातित्व लेकर स्मृति शेष शोक के साथ लोक व्यवहार के कार्यो का मार्ग प्रशस्त होता है। जबलपुर पंचायत अध्यक्ष एवं उपिस्थत सम्माननीय प्रतिनिधी जन अपने उरगार में स्वर्गासीन व्यक्ति के योगदान, उपलब्धियों आदि का वर्णन कर परिवार को सदमार्ग पर चलते हुये जीवन यापन का परामर्श देते हैं तथा सभी स्थितियों में समाज उनके साथ है ऐसा साहस व भरोसा दिलाते हैं। स्वर्गवासी आत्मा की शांति के लिये सभी उपिस्थत जन 2 मिनिट का मौन रख ईश्वर से प्रार्थना करते हैं एवं यथागत के छायाचित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर सभा का समापन होता है। नोट :- कृपया शुद्धता के दिन बैठक कक्ष में चाय आदि की पेशकाश न करें।

त्रयोदशी संस्कार

नोट :- इस अवसर पर दिया जाने वाला मृत्यु भोज बन्द है।फिर भी समाज के बन्धुगज इस कार्यक्रम को नयारूप देकर गंगभोज भण्डारा के नाम से मृत्यु भोज का आयोजन कर रहे है जिसे पुर्णत: बन्द किया जावें ।

1. गंगाजली पूजन :-
इस पूजन हेतु शुद्धता अथवा दशगात्र के समय लाया गया गंगाजल अथवा नर्मदाजल, ताम्र अथवा पीतल के एक पात्र में रख, उसका पूजन किया जाता है। मृतक के तेरह दिन पूर्ण होने पर सम्पूर्ण मृत्यु संस्कार पिण्डदान आदि कराये जाते हैं, साथ में छ: मासी/वर्षी का कार्य भी उसी समय सुविधानुसार कराया जा सकता है, अत: वर्शी का पूजन आचार्य द्वारा अलग से कराया जाता है, उसके लिये मृतक का चित्र बनाने गंगाजी अथवा अन्य पवित्र नदी की रेंणुका (रज) की आवश्यकता होती है।

सामान सूची :- पूजन सामग्री - गंगाजली, गंगाजल से पूर्ण, गाय गोबर, गाय का दूध 200 ग्राम ‘रेणुका’ इत्र, गुलाबजल, रोरी, अक्षत, शहद, मिष्ठान्न, बताशा आदि, चन्दन घिसा हुआ, गोपी चन्दन 25 ग्राम, तुलसी की माला 25 नग, सफेद वस्त्र 1 मीटर, लाल वस्त्र 1 मीटर, सुपाड़ी बड़ी, लौंग, इलायची, खुले पान, कलश का पात्र, बेल, मीठा 100 ग्राम, दिया, बाती, अगरबत्ती, माचिस 1 नग, कपूर, फूलमाला, 500 ग्राम चावल की खीर अथवा 500 ग्राम खोवा शक्कर, पत्तल (गड्डी दोना 1) पूजन का जल पात्र, कुशा पैंती, जनेऊ 30 नग, रंगीन सूत / सफेद कच्चा सूत 1 मिट्टी, काली तिल 50 ग्राम आदि चांदी का तार 1 नग।

आचार्य को दान हेतु सामग्री :- नये वस्त्र धोती, कुरता, गमछा, शैया (खटिया) गद्दा, पल्ली, दरी, चादर,तकिया, मच्छरदानी, जूते, छड़ी, अन्नदान स्वेच्छानुसार, चांदी-स्वर्ण आभूषण आदि यथाशक्ति दक्षिणा।

ब्राम्हणों का दान 25 (13+12) नग :- 1- लोटा, गिलास, थाली आदि में से कोई एक पात्र 25 नग, 2- गमछा, टावल, धोती, कुरता, चादर, आदि में से कोई एक 25 नग साथ में उपर लिखी गोपीचन्दन, तुलसी माला, जनेउ, प्रत्येक पात्र में एक-एक प्रति वस्तु रखें, नगद राशि 21 /-, 51/- रू. प्रत्येक पात्र में रखकर, भोजन उपरान्त उन्हें भेंट देकर चरण स्पर्श कर आशीर्वाद ग्रहण करें। साथ में पूज्य आचार्य जी को आसन में बिठा, उनका पूजन कर (रोरी, तिलक, माला से) आशीर्वाद ग्रहणकर, उन्हें भोजन करा साथ में दान सामग्री दे बिदा करें। नोट :- पूजन के समय 2 भोग की थाली निकालें, एक मृत आत्मा हेतु, एक गंगा पूजन हेतु (गंगा पूजन की थाली का प्रसाद सपरिवार ग्रहण करें। मृतक की थाली का प्रसाद आचार्य के बताये अनुसार अर्पित करें। 1 थाली गौ की निकालें तथा कुत्ता के लिये भोजन निकालें। पश्चात ब्राम्हण समाज को भोजन करायें, उसके बाद मानदान एवं बाहर से आये अतिथियों को भोजन करायें, पश्चात दाहकर्मकरने वाला स्वयं अपने पूर्ण परिवार के साथ अपने पूर्वजों पितामहों का स्मरण कर, भोजन का थोड़ा सा मिश्रण अग्नि को समर्पित कर स्वंय भोजन ग्रहण करें। इसके अतिरिक्त यथाशक्ति अनाथ निराश्रित भिच्छु आदि का भोजन तथा वस्त्र आदि दान देकर उनका आशीर्वाद लें।

संकलन कर्ता-रमेश बाबू गंधी, ग्वालियर (म.प्र.)

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