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कहानी पक्षीराज का सबक

कहानी

पक्षीराज का सबक

बहुत समय पहले एक राजा था चंद्रसेन। उसकी रानी कठोर स्वभाव की थी। राजा चंद्रसेन उसके आगे कुछ नहीं बोल पाता था। रानी राजा से नित नई फरमाइसें करती रहती और राजा के पास उन्हें पूरी करने के अलावा कोई उपाय नहीं था। रानी की फरमाइसों से राजा ही नहीं पूरी प्रजा भी परेशान थी। एक दिन रानी ने राजा से अजीब फरमाइस कर डाली। उसने राजा से एक येसा महल तैयार करने को कहा जिसमे सिर्फ पंछियों के पंख लगे हों। राजा यह सुनकर हेरान रह गया। उसे लगा कि रानी की बात मानने पर बहुत सारे पंछियों को मरना पड़ेगा। उसने रानी को समझाने की कोशिश की लेकिन वह अपनी जिद पर अड़ी रही। राजा ने अपना स्वर थोडा कठोर किया तो रानी गुस्सा हो गई। और उसने खाना पीना छोड़ दिया। आखिरकार राजा को झुकना पड़ा। उसने पछियों के राजा को बुलवाने के लिए मंत्री के हाथ से संदेष भेजा। पछियो को आने वाली बिपत्ति का पहले ही आभास हो जाता है इसलिए पछीराज समझ गया कि अवश्य दाल में कुछ काला है।पछीराज ने मंत्री से कहलवा दिया कि वह अभी किसी जरुरी काम में व्यस्त है। काम समाप्त होते ही तुरंत राजा के सामने पेश हो जावेगा। मंत्री ने राजा को जाकर पछीराज का सन्देश दे दिया। कुछ समय बाद पछीराज राजा से मिला। राजा ने उससे पूछा पछीराज ऐसा क्या काम था जिसकी वजह से आपको रुकना पड़ा? पछीराज बोला, महाराज हमारे सामने एक सवाल था कि देश में पुरुष ज्वादा है अथवा महिलायें। सभी पछी इस गिनती में लगे हुए थे। बस, काम समाप्त होते ही में आपके सामने हाजिर हो गया। राजा बोला "फिर क्या परिणाम निकला? पछीराज बोला "महाराज" महलायें अधिक है।राजा चंद्रसेन हैरान हो गया। वह बोला लेकिन हमारी गड़ना के अनुसार तो पुरुष अधिक है। यदि ज्वादा नहीं तो बराबर तो होंगे ही। पछीराज ने सिर हिलाते हुए कहा महाराज हमने उन पुरुषों को भी महलाओं में शामिल किया जो हर समय स्त्रियों की प्रत्येक अनुचित बातों को मान लेते है। जो स्त्रियों के दास बन चुके है। उनके आगे बोल नहीं पाते। यह सुनकर राजा चुप हो गया। वह इधर-उधर झांकने लगा। उसने पछीराज से पंखो का महल बनाने की बात ही नहीं की। उसने सम्मान पूर्वक पछीराज को वहां से विदा किया और तुरंत रानी के पास गया। रानी की इस अनुचित मांग को उसने कठोर स्वर में मानने से इंकार कर दिया। उसके बाद वह कभी भी रानी की अनुचित मांग पर ध्यान नहीं देता था। इस तरह पछीराज की चतुराई से सभी पंछी तो बचे ही राजा और प्रजा ने भी राहत की साँस ली।

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